Skip to main content

Posts

स्वर्गीय पदमविभूषण श्री सुंदर लाल बहुगुणा के जन्मदिन और पुण्यतिथि पर लगाएं पौधे

मेरे पिता पदमविभूषण श्री सुंदरलाल बहुगुणा के परलोक गमन पर हमारे परिवार को दुख की इस घड़ी में साथ देने के लिए आप सभी का हृदय से आभार। शारीरिक रूप से भले ही वे अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन वे अपने विचारों में हमेशा जिंदा रहेंगे। उनकी याद में हर व्यक्ति एक पौधा लगाए और प्रकृति संरक्षण का संकल्प ले यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। उनके जन्मदिन 9 जनवरी और पुण्यतिथि 21 मई को पौधे लगाएं। उनकी कर्मस्थली सिल्यारा से पीपल के पौधे रोपकर इसकी शुरुआत कर दी गई है। वहीं पर उनका स्मारक बनाने की भी योजना है।उनका मननना था कि पेड़ पौधे भी इनसान की भावनाओं को महसूस करते हैं। वे पेड़-पौधों को गीत संगीत सुनाने की बात करते और खुद भी पौध रोपण के समय वृक्ष मानव रिचर्ड सेंट बेकर की वृक्षों के लिए गाई प्रार्थना करते थे। आप लोग भी पौध रोपण के समय यह प्रार्थना कर सकते हैं।  स्वर्गीय सुंदरलाल बहुगुणा अपनी आवश्यकताओं को न्यूनतम कर प्रकृति से कम से कम लेने और उसका ऋण चुकाने की बात करते थे। जो कहते थे उसको अपने जीवन में भी उतारते थे। घटते भूजल के प्रति चेताते हुए उन्होंने पांच दशक से भी पहले चावल खाना इसलिए छोड़ दिया थ...

सुंदर लाल बहुगुणा:12ः वनों की नीलामी का विरोध

 सुंदर लाल बहुगुणा:12ः वनों की नीलामी का विरोध अस्कोट से आराकोट अभियान के जरिए युवाओं के चिपको आंदोलन से जुड़ने से जहां आंदोलन को व्यापक स्वरूप मिला वही आंदोलन का कुमाऊं में भी विस्तार हुआ। आंदोलन से छात्र और युवा बड़ी संख्या में जुड़े। 3 अक्टूबर 1974 को उत्तरकाशी में हो रही वनों की नीलामी के विरोध में सुंदर लाल बहुगुणा अपने सर्वोदयी साथियों के साथ नीलामी हाॅल में घुस गए और इसका विरोध किया। नीलामी नहीं रोके जाने पर वे पास ही के हनुमान मंदिर में उपवास पर बैठ गए। उनका यह उपवास दो हफ्ते तक चला।  उधर इसी महीने 28 तारीख को नैनीताल के शैले हाॅल में शमशेर सिंह बिष्ट की अगुवाई में छात्र और युवा हाॅल में घुस गए और वनों की नीलामी के विरोध में नारे लगाने लगे। एसडीएम के आदेश पर बिष्ट, गोपाल दत्त पांडे, शेर सिंह धौनी, खड़ग सिंह बोरा, देवेन्द्र सनवाल, बालम सिंह जनोटी, जसवंत सिंह बिष्ट और हरीश रावत समेत 18 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के विरोध में बड़ी संख्या में छात्र थाने पहुंच गए। उधर अल्मोड़ा में छात्रों ने सभी स्कूल-काॅलेज और बाजार बंद करा दिए। व्यापक विरोध के चलते गिरफ्तार आ...

सुंदर लाल बहुगुणा: 11 अस्कोट से आराकोट अभियान से युवाओं को जोड़ा

  यात्रा के पदयात्री: शमशेर बिष्ट, प्रताप शिखर, शेखर पाठक और कुंवर प्रसून सुंदर लाल बहुगुणा: 11  अस्कोट से आराकोट अभियान से युवाओं को जोड़ा शराबबंदी आंदोलन की सफलता के बाद 1973 में हुए चिपको आंदोलन को व्यापक स्वरूप देने के लिए सुंदर लाल बहुगुणा ने युवाओं को कुमाऊं के अस्कोट से गढ़वाल के आराकोट तक की यात्रा के माध्यम से जोड़ा। 700 किमी की यात्रा 44 दिन में पूरी हुई। यात्रा की शुरुआत के लिए टिहरी को राजशाही की गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए शहीद हुए अमर शहीद श्रीदेव सुमन के जन्मदिन 25 मई को चुना गया। अस्कोट- आराकोट अभियान में कुमाऊं से शेखर पाठक और शमशेर सिंह बिष्ट और गढ़वाल से प्रताप शिखर, कुंवर प्रसून और विजय जड़धारी इसमें शामिल हुए। ये सभी छात्र थे। बीच- बीच में कुछ और युवा भी यात्रा में शामिल हुए। यात्रा का विषय रखा गया वन संरक्षण, शराबबंदी, स्त्री शक्ति जागरण और युवा पलायन रोकना। 25 मई 1974 को पिथौरागढ़ के अस्कोट से यात्रा की शुरुआत हुई। तय हुआ कि जन सहयोग से ही यात्रा चलेगी और यात्री गांवों में रुक कर सभाओं के माध्यम से लोगों के साथ वन संरक्षण, शराबबंदी, स्त्री शक्ति जागरण और यु...

सुंदरलाल बहुगुणाः 10ः क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार

      सिल्यारा गांव में पनचक्की चलाते सुंदर लाल बहुगुणा   पदयात्रा के दौरान ग्रामीणों का हाल जानते सुंदर लाल बहुगुणा  सुंदरलाल बहुगुणाः 10ः  क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी पानी और बयार चिपको आंदोलन की शुरुआत वन पर गांवों के अधिकार के विचार के साथ हुई। तब यह सोच उपजी कि वनों के व्यापारिक दोहन से ही वन समाप्त हो रहे हैं। ठेकेदार मुनाफे के लिए आवंटित पेड़ों से कई ज्यादा पेड़ काट डालता है। नुकसान स्थानीय लोगों को भुगतना पड़ता है। ऐसे में वन सहकारी समिति के माध्यम से स्थानीय लोगों को वन आधारित रोजगार का विचार पनपा। उत्तराखंड सर्वोदय मंडल की स्थापना हुई और आनंद सिंह बिष्ट इसके अध्यक्ष बने। सर्वोदय सेवकों ने अपनी संस्थाओं के माध्यम से वन आधारित उद्योग लगाने शुरू कर दिए। चंडी प्रसाद भट्ट ने दशोली ग्राम स्वराज मंडल की स्थापना की। दशोली ग्राम स्वराज मंडल को अपनी आरा मशीन के लिए पांच पेड़ नहीं मिले उधर खेलकूद का सामान बनाने वाली इलाहाबाद की साइमन कंपनी को मार्च 1973 में चमोली जिले में अंगू के हजारों पेड़ आवंटित कर दिए गए। साइमन कंपनी ने देहरादून की सरकारी स्पोट्रर्स कंपनी ...

Sundar Lal Bahuguna 9: The rise of Chipko movement in this way

SUNDER LAL BAHUGUNA GANDHI OF THE ENVIRONMENT SUBSCRIBE Sundar Lal Bahuguna 9: The rise of Chipko movement in this way March 08, 2020 Ghanshyam Sailani and Chandi Prasad Bhatt Sundar Lal Bahuguna 9: The rise of Chipko movement During his travels, Sundar Lal Bahuguna closely understood the consequences of forest destruction and the benefits of forest protection. He observed that trees have the ability to bind soil and conserve water. For the British (who spread the Pines in the hill) and the forest department it was associated with, the forests were only a source of wood, Lisa and trading. He believed that the first use of forests should be for the people living nearby so the food, grass, wood and fodder could be easily available to them. He said that the real benefits of forests are soil, air and water. This thinking later led to the slogans of the Chipko movement: ...

सुंदर लाल बहुगुणा 9: इस तरह हुआ चिपको आंदोलन का उदय

Click here to access english version सुंदर लाल बहुगुणा  और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विमला बहुगुणा अपनी यात्राओं के दौरान सुंदर लाल बहुगुणा ने वन विनाश के परिणामों और वन संरक्षण के फायदों को बारीकी से समझा। उन्होने देखा कि पेड़ों में मिट्टी को बांधे रखने और जल संरक्षण की  क्षमता है। अंग्रेजों के फैलाए चीड़ और इसी से जुड़ी वन विभाग की वनों की परिभाषा ; जंगलों की देन लकड़ी लीसा और व्यापार भी उनके गले नहीं उतरी। उनका मानना था कि वनों का पहला उपयोग पास रह रहे लोगों के लिए हो। उससे उन्हें अपनी जरूरत की चीजें खाद्य पदार्थ, घास, लकड़ी और चारा घर के पास ही सुलभ हों। उन्होंने कहा कि वनों की असली देन तो मिट्टी,पानी और हवा है। उनकी इसी सोच से बाद में चिपको आंदोलन के नारे : क्या हैं जंगल के उपकरण, मिट्टी पानी और बयार, मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार का जन्म हुआ।   उन्होंने वन अधिकारों के लिए बड़कोट के तिलाड़ी में शहीद हुए ग्रामीणों के शहादत दिवस 30 मई को वन दिवस के रूप मे मनाने का 30 मई 1967 में निश्चय किया। इसमें अपने सर्वोदयी साथियों के अलावा सभी से शामिल होने की उन्होंने ...

Chipko Leader SL Bahuguna speak

सुंदर लाल बहु्गुणा 8: 120 दिन में पैदल नाप दिया पूरा उत्तराखंड

यात्रा के दौरान जाजल में  caption यात्रा की समाप्ति पर रामझूला में सुंदर लाल बहु्गुणा 8: 120 दिन में पैदल नाप दिया पूरा उत्तराखंड शराब बंदी के सफल आंदोलन के बाद सुंदर लाल बहुगुणा ने जातीय समानता, ग्रामदान, शराबबंदी, महिला शक्ति जागरण और वन संरक्षण का संदेश पूरे उत्तराखंड में फैलाने की ठानी। 1973 में दीपावली के दिन उन्होंने सिमलासू से अपनी यात्रा शुरू की। अपने आध्यात्मिक गुरु और डिवाइन लाइफ सोसायटी के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानंद का आशीर्वाद लेकर 25 अक्तूबर को उन्होंने यात्रा शुरू की। इस मौके पर मुनिकीरेती से पधारे स्वामी चिदांनंद ने कहा, भारतीय संस्कृति का महान संदेश फैलाने की शक्ति मैं 120 दिन की इस यात्रा में देखता हूं। वर्ष 1906 में वेदांती संत स्वामी रामतीर्थ ने दीपावली के दिन यही भिलंगना नदी में जल समाधि ली थी। लाहौर में गणित के प्रोफेसर रामतीर्थ स्वामी विवेकानंद से प्रभावित होकर 1901 में सुदूर टिहरी आए और स्वामी रामतीर्थ बन कर यहीं के होकर रह गए। सुन्दर लाल बहुगुणा ने पहला पड़ाव अपने जन्मस्थल मरोड़ा गांव को बनाया। इस गांव को राजभक्त परिवार से मतभेद के बाद ...
SUNDER LAL BAHUGUNA GANDHI OF THE ENVIRONMENT SUBSCRIBE SEARCH Sundar Lal Bahuguna 5: Did not give up on Gandhian thought February 02, 2020 Young Sundar Lal Bahuguna at the inception of Silyara Ashram Beautiful Lal Bahuguna with Meera Ben Sundar Lal Bahuguna 5: Did not give up on the Gandhian idea: To bring the idea of Mahatma Gandhi of village Swaraj and Swablambi village to the ground, his English disciple Meera Ben made his hideout in 1949 in the beautiful village of Gainwali in Tehri.  Traumatized by the machinations and leaders of the bureaucracy, after a few years, Meera Ben left India and went back to Viana Ashtria, but Sundar Lal Bahuguna did not give up. She pushed forward Meera Ben's debut at the Silera Ashram.  There cow rearing, farming and watermill were made the basis of economic independence.  Madeleine Slade, the daughter of Commander-in-Chief Admiral Sir ...
SUNDER LAL BAHUGUNA GANDHI OF THE ENVIRONMENT SUBSCRIBE SEARCH February 16, 2020 Sunder Lal Bahuguna :  4  married Dola palanquin Even after the entry of the craftsmen in Yamunotri Gangotri and Budhakedar temple in the year 1956, Sundar Lal Bahuguna continued his fight for ethnic equality.  At that time it was a dream even for the rich artisans to organize marriages and ceremonies with great pomp. Even people belonging to the Khas caste could not carry out the procession with Dola palanquin.  In such a situation, in 1961, Bharpuru Nagwan of the old man associated with Harijan Sevak Sangh and Sunder Lal Bahuguna for ethnic equality expressed his desire to get his son Bihari Lal married with Dola palanquin.  Before that, such efforts were violently opposed by the upper castes twice.  In Pangrana Hindaon of Tehri district, the bridegroom who was sitting in a palanquin was taken hostage....
SUNDER LAL BAHUGUNA GANDHI OF THE ENVIRONMENT SUBSCRIBE SEARCH Sunder Lal Bahuguna 2 started with the fight to eradicate caste discrimination January 22, 2020 The battle to eradicate caste discrimination started with the battle of Sridev Suman against the Tehri monarchy, after completing his graduation from Lahore, Sundar Lal Bahuguna as Congress official in the Tehri State.   Meanwhile, on January 11, 1948, the rebellion spread by the killing of Nagendra Saklani and Molu Bhardari by the monarchy led to the overthrow of the monarchy on 14 January 1948.   From Kirtinagar, a large group of people with dead bodies of both the martyrs moved to Tehri.   The public also arrived at Tehri on 14 January with pulse rice for Makarain from every corner of Tehri.   There was so much anger against the monarchy in the public that in order to save the lives of the people of the monarchy, they had to be lodged in Tehri J...