Skip to main content

सुंदर लाल बहुगुणा 19: आतंक का पर्याय बने उम्मेद सिंह ने छोड़ी अपराध की दुनिया




उत्तराखंड को 1973-74 में पैदल नाप रहे बहुगुणा को उम्मेद सिंह मिला था जंगल में
जंगल से बहुगुणा उसे लौटा लाए घर, रात में मॉं के सामने लिवाई अपराध छोड़ने की शपथ
उम्मेद लूटपाट और अवैध शराब बनाना छोड़कर गांव में बिताने लगा सामान्य जीवन
स्थानीय प्रशासन ने ली राहत की सांस, पिथौरागढ़ में आयोजित हुआ बड़ा समारोह


उत्तराखंड को पैदल नापते हुए सुंदर लाल बहुगुणा वर्ष 1973 के आखिर में जब पिथौरगढ़ जिले में पहुंचे तो वहां दस्यु उम्मेद सिंह का आतंक था। सरकारी उपेक्षा से खिन्न पूर्व फौजी उम्मेद सिंह ने अपराध का रास्ता चुन लिया था। वह दारू (कच्ची शराब) बनाता और लूटपाट भी करता था। एक बार पुलिस ने उसे पकड़ कर लोहाघाट की जेल भी पहुंचाया लेकिन छूटते ही वह फिर से अपराध की दुनिया मंे शामिल हो गया।

एक बार जेल जाने के बाद बीसा बजेड़ गांव के उम्मेद सिंह ने पुलिस की गिरफ्त से बचने के लिए जंगलों में अपना ठिकना बना लिया था। साथ ही वह अपना ठिकाना भी बदलता रहता था। जंगलों में ही दारू बनाकर वह उसका अवैध करोबार करने लगा। इसमें सहयोग केे लिए उसने अपना एक गिरोह भी बना लिया था। यही नहीं वह अपने इलाके से गुजरने वाले ग्रामीणों से लूटपाट भी करता था। उसका आतंक इतना फैल गया कि पुलिस भी उस पर हाथ डालने से डरती थी। उत्तराखंड में 120 दिन की अपनी यात्रा के दौरान सुंदर लाल बहुगुणा अपने साथियों के साथ पिथौरागढ़ जाते हुए जब उसके इलाके से गुजर रहे थे। तो उम्मेद सिंह ने उन्हें घेर लिया। उनके पास रुपया पैसा तो कुछ था नही ंतो उम्मेद सिंह उन्हें डराने के लिए जान से मारने की धमकी देने लगा। बहुगुणा के साथी बुरी तरह डर गए। ऐसे में बहुगुणा वहीं एक पेड़ के नीचे बैठ गए और प्रार्थना करने लगे। प्रार्थना समाप्त होने के बाद उन्होंने आंख खोली तो उम्मेद सिंह को पास ही बैठा पाया। वह बड़बड़ा रहा था और सरकार और प्रशासन को गालियां दे रहा था। उम्मेद सिंह कह रहा था कि वह देश के लिए सीमा पर लड़ते-लड़ते वह एक दिन वह अकेले छूट गया और चीन की फौज ने उसे बंदी बना लिया। लंबे समय के बाद जब वह चीन की जेल से छूट कर देश वापस लौटा तो किसी ने उसकी सुध नहीं ली। ऐसे में सरकार और प्रशासन के प्रति उसके मन में नफरत घर कर गयी और वह बागी बन गया।

बहुगुणा ने उससे बुराई का रास्ता छोड़ने की अपील करते हुए कहा कि यदि वह गांव लौटकर सामान्य जीवन व्यतीत करने लगेगा तो वह प्रयास करेंगे कि उसके खिलाफ कोई कार्रवाई न हो। उन्होंने कहा कि वे खुद उसको साथ लेकर उसके घर चलेंगे।उम्मेद सिंह को अपने  जीवन में ऐसा पहला फक्कड़ इंसान मिला था जो उससे नहीं डरा और यही नहीं उसने उसकी राम कहानी भी ध्यान से सुनी। उम्मेद सिंह बहुगुणा के साथ गांव लौटने को राजी हो गया। गिरोह के उसके और साथी इसके लिए राजी नहीं थे। लेकिन उम्मेद सिंह के कहने पर वे भी साथ हो लिए। रास्ते में पड़ने वाले गांवों मे हुई सभाओं और ग्रामीणों के बहुगुणा के प्रति सम्मान को देखकर उम्मेद सिंह का बहुगुणा की कही बातों पर भरोसा होगया। रात में बहुगुणा और उनके साथी बीसा बजेड़ उम्मेद सिंह के घर पर ही रुके। सदन मिश्रा भी उस दिन वहां मौजूद थे। बकौल मिश्रा गांव में रात में हुई सभा में उम्मेद सिंह ने अपनी मॉं के समक्ष बुराई का रास्ता छोड़ने की कसम खाई। उसने बताया कि उसने जंगल में कच्ची शराब की अपनी भट्टी तोड़ दी है। और शराब बनाने के लिए लाई 110 गुड़ की भेलियां भी जानवरों के लिए गांव वालों में बांट दी हैं।

सदन मिश्रा के अनुसार उम्मेद सिंह अगले दिन पिथौरगढ़ तक बहुगुणा की पदयात्रा टोली के साथ ही गया। वहां पर एक बड़ा समारोह आयेजित किया गया। इसमें प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल हुए। समारोह में उम्मेद सिंह ने सुंदर लाल बहुगुणा से प्रभावित होकर अपराध की दुनिया छोड़ कर सामान्य जीवन जीने की अपनी घोषणा दोहराई तो लोगों ने उसका करतल ध्वनि से स्वागत किया। उम्मेद सिंह की गतिविधियों से त्रस्त जिला प्रशासन ने इसके लिए सुंदर लाल बहुगुणा का आभार जताया और राहत की सांस ली।



जारी--------

Comments

Popular posts from this blog

सुंदर लाल बहुगुणा 9: इस तरह हुआ चिपको आंदोलन का उदय

Click here to access english version सुंदर लाल बहुगुणा  और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विमला बहुगुणा अपनी यात्राओं के दौरान सुंदर लाल बहुगुणा ने वन विनाश के परिणामों और वन संरक्षण के फायदों को बारीकी से समझा। उन्होने देखा कि पेड़ों में मिट्टी को बांधे रखने और जल संरक्षण की  क्षमता है। अंग्रेजों के फैलाए चीड़ और इसी से जुड़ी वन विभाग की वनों की परिभाषा ; जंगलों की देन लकड़ी लीसा और व्यापार भी उनके गले नहीं उतरी। उनका मानना था कि वनों का पहला उपयोग पास रह रहे लोगों के लिए हो। उससे उन्हें अपनी जरूरत की चीजें खाद्य पदार्थ, घास, लकड़ी और चारा घर के पास ही सुलभ हों। उन्होंने कहा कि वनों की असली देन तो मिट्टी,पानी और हवा है। उनकी इसी सोच से बाद में चिपको आंदोलन के नारे : क्या हैं जंगल के उपकरण, मिट्टी पानी और बयार, मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार का जन्म हुआ।   उन्होंने वन अधिकारों के लिए बड़कोट के तिलाड़ी में शहीद हुए ग्रामीणों के शहादत दिवस 30 मई को वन दिवस के रूप मे मनाने का 30 मई 1967 में निश्चय किया। इसमें अपने सर्वोदयी साथियों के अलावा सभी से शामिल होने की उन्होंने ...

सुंदर लाल बहुगुणा 2 - जातीय भेदभाव मिटाने की लड़ाई से हुई शुरुआत

अंग्रेजी वर्जन के लिए इस लिंक पर क्लिक करें https://bahugunap.blogspot.com/2025/07/sunder-lal-bahuguna-2-fight-against.html टिहरी राजशाही के खिलाफ श्रीदेव सुमन की लड़ाई को लाहौर से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुंदर लाल बहुगुणा ने टिहरी रियासत में कांग्रेस के पदाधिकारी के रूप में आगे बढ़ाया। इस बीच 11 जनवरी 1948 को नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी को राजशाही द्वारा की गई हत्या से फैली विद्रोह की चिनगारी ने 14 जनवरी 1948 राजशाही का तख्ता पलट दिया। कीर्तिनगर से दोनों शहीदों के शवों को लेकर अपार जनसमूह टिहरी के लिए बढ़ चला। टिहरी के कोने-कोने से जनता  भी 14 जनवरी को मकरैण के लिए साथ में दाल  चावल लेकर  टिहरी पहुंची। जनता में राजशाही के खिलाफ इतना आक्रोश था कि राजतंत्र के लोगों की जान बचाने को टिहरी जेल में बंद करना पड़ा। उसी दिन राजशाही का आखिरी दिन था। प्रजामंडल की सरकार बन गई। तब सुंदर लाल बहुगुणा प्रजामंडल के मंत्री थे लेकिन वे सरकार में शामिल होने की बजाय कांग्रेस के महामंत्री बने। वे घंटाघर के पास कांग्रेस के दफ्तर में रहते थे। तब शराब का प्रकोप जोरों पर था। सबसे खराब स्...

सुंदर लाल बहुगुणा 7: टिहरी में आंदोलन कर पहाड़ में बंद कराई शराब

टिहरी में शराब बंदी के जुलूस में नन्हा प्रदीप (पीरू) वाचस्पति मैठाणी और भवानी भाई सिल्यारा आश्रम के नजदीकी कस्बे में शराब के खिलाफ सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में हुए सफल आंदोलन के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने पहाड़ की शराब की दुकानें बंद कर दीं। लेकिन 1971 के नवंबर में अचानक टिहरी में शराब की दुकान खोल दी गई। सुंदर लाल बहुगुणा  वहां शराब की दुकान के आगे उपवास पर बैठ गए। उनके सहयोगी घनश्ययाम सैलानी, चंडी प्रसाद भट्ट, धर्मानंद नौटियाल, सुरेंद्र दत्त भट्ट, चिरंजीलाल भट्ट, आनंद सिंह बिष्ट, भवानी भाई गांव-गांव जाकर शराब के खिलाफ आंदोलन के प्रचार में जुट गए। जन कवि धनश्याम सैलानी के गढ़वाली गीत ने जन-जन को झकझोर दिया।  गाने के बोल थे: हिटा दिदी, हिटा भुल्यों चला टिहरी जौला दारू कू भूत लग्यूं तै भूत भगौला। महिलाएं घर-बार छोड़कर टिहरी के लिए चल पड़ीं। दिन में धरने पर इस कदर भीड़ जुटने लगी कि शराबियों की शराब की दुकान से शराब खरीदने की हिम्मत नहीं होती थी।ऐसे में शराबी दुकान से रात में शराब खरीद कर ले जाने लगे। वे उपवास पर बैठे सुंदर लाल बहुगुणा को अपशब्द भी क...