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World Environment Day 2022

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सुंदर लाल बहुगुणा 9: इस तरह हुआ चिपको आंदोलन का उदय

Click here to access english version सुंदर लाल बहुगुणा  और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती विमला बहुगुणा अपनी यात्राओं के दौरान सुंदर लाल बहुगुणा ने वन विनाश के परिणामों और वन संरक्षण के फायदों को बारीकी से समझा। उन्होने देखा कि पेड़ों में मिट्टी को बांधे रखने और जल संरक्षण की  क्षमता है। अंग्रेजों के फैलाए चीड़ और इसी से जुड़ी वन विभाग की वनों की परिभाषा ; जंगलों की देन लकड़ी लीसा और व्यापार भी उनके गले नहीं उतरी। उनका मानना था कि वनों का पहला उपयोग पास रह रहे लोगों के लिए हो। उससे उन्हें अपनी जरूरत की चीजें खाद्य पदार्थ, घास, लकड़ी और चारा घर के पास ही सुलभ हों। उन्होंने कहा कि वनों की असली देन तो मिट्टी,पानी और हवा है। उनकी इसी सोच से बाद में चिपको आंदोलन के नारे : क्या हैं जंगल के उपकरण, मिट्टी पानी और बयार, मिट्टी पानी और बयार, जिंदा रहने के आधार का जन्म हुआ।   उन्होंने वन अधिकारों के लिए बड़कोट के तिलाड़ी में शहीद हुए ग्रामीणों के शहादत दिवस 30 मई को वन दिवस के रूप मे मनाने का 30 मई 1967 में निश्चय किया। इसमें अपने सर्वोदयी साथियों के अलावा सभी से शामिल होने की उन्होंने ...

सुंदर लाल बहुगुणा 2 - जातीय भेदभाव मिटाने की लड़ाई से हुई शुरुआत

अंग्रेजी वर्जन के लिए इस लिंक पर क्लिक करें https://bahugunap.blogspot.com/2025/07/sunder-lal-bahuguna-2-fight-against.html टिहरी राजशाही के खिलाफ श्रीदेव सुमन की लड़ाई को लाहौर से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद सुंदर लाल बहुगुणा ने टिहरी रियासत में कांग्रेस के पदाधिकारी के रूप में आगे बढ़ाया। इस बीच 11 जनवरी 1948 को नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी को राजशाही द्वारा की गई हत्या से फैली विद्रोह की चिनगारी ने 14 जनवरी 1948 राजशाही का तख्ता पलट दिया। कीर्तिनगर से दोनों शहीदों के शवों को लेकर अपार जनसमूह टिहरी के लिए बढ़ चला। टिहरी के कोने-कोने से जनता  भी 14 जनवरी को मकरैण के लिए साथ में दाल  चावल लेकर  टिहरी पहुंची। जनता में राजशाही के खिलाफ इतना आक्रोश था कि राजतंत्र के लोगों की जान बचाने को टिहरी जेल में बंद करना पड़ा। उसी दिन राजशाही का आखिरी दिन था। प्रजामंडल की सरकार बन गई। तब सुंदर लाल बहुगुणा प्रजामंडल के मंत्री थे लेकिन वे सरकार में शामिल होने की बजाय कांग्रेस के महामंत्री बने। वे घंटाघर के पास कांग्रेस के दफ्तर में रहते थे। तब शराब का प्रकोप जोरों पर था। सबसे खराब स्...

सुंदर लाल बहुगुणा 7: टिहरी में आंदोलन कर पहाड़ में बंद कराई शराब

टिहरी में शराब बंदी के जुलूस में नन्हा प्रदीप (पीरू) वाचस्पति मैठाणी और भवानी भाई सिल्यारा आश्रम के नजदीकी कस्बे में शराब के खिलाफ सुंदर लाल बहुगुणा के नेतृत्व में हुए सफल आंदोलन के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने पहाड़ की शराब की दुकानें बंद कर दीं। लेकिन 1971 के नवंबर में अचानक टिहरी में शराब की दुकान खोल दी गई। सुंदर लाल बहुगुणा  वहां शराब की दुकान के आगे उपवास पर बैठ गए। उनके सहयोगी घनश्ययाम सैलानी, चंडी प्रसाद भट्ट, धर्मानंद नौटियाल, सुरेंद्र दत्त भट्ट, चिरंजीलाल भट्ट, आनंद सिंह बिष्ट, भवानी भाई गांव-गांव जाकर शराब के खिलाफ आंदोलन के प्रचार में जुट गए। जन कवि धनश्याम सैलानी के गढ़वाली गीत ने जन-जन को झकझोर दिया।  गाने के बोल थे: हिटा दिदी, हिटा भुल्यों चला टिहरी जौला दारू कू भूत लग्यूं तै भूत भगौला। महिलाएं घर-बार छोड़कर टिहरी के लिए चल पड़ीं। दिन में धरने पर इस कदर भीड़ जुटने लगी कि शराबियों की शराब की दुकान से शराब खरीदने की हिम्मत नहीं होती थी।ऐसे में शराबी दुकान से रात में शराब खरीद कर ले जाने लगे। वे उपवास पर बैठे सुंदर लाल बहुगुणा को अपशब्द भी क...